गुरु-शिष्य परंपरा


संत कबीर ने गुरु के लिए कहा है कि,
गुरु गोबिन्द दोउ खडे काके लागूँ पाँय,
बलिहारी गुरु आपने गोबिन्द दियो बताय।

इसका मतलब यह है कि गुरु और ईश्वर दोनों साथ
ही खड़े हैं इसलिए पहले किस के पैर छूने हैं
ऐसी दुविधा आए तब पहले गुरु को वंदन करें
क्युंकि उनकी वजह से ही ईश्वर
के दर्शन हुए हैं। उनके बगैर ईश्वर तक पहुँचना
असंभव है।

कबीरजी का एक दूसरा प्रचलित
दोहा है,
कबीरा ते नर अंध है गुरु को कहते और
हरि रूठे गुरु ठौर है गुरु रूठे नही ठौर

यानि की अंधा है वह जो गुरु को
नहीं समझ पाता। अगर ईश्वर नाराज़ हो जाए तो
गुरु बचा सकता है, लेकिन अगर गुरु नाराज़ हो जाए तब कौन
बचाएगा।

गुरु पूर्णिमा कैसे शुरू हुई ?


ॐ जय सच्चिदानंद जी 

ऋषियों और देवताओं ने महर्षि व्यास से अनुरोध किया था कि जिस
तरह सभी देवी-देवताओं की
पूजा के लिए कोई न कोई दिन निर्धारित है उसी तरह
गुरुओं और महापुरुषों की अर्चना के लिए
भी एक दिन निश्चित होना चाहिए। इससे
सभी शिष्य और साधक अपने गुरुओं के प्रति कृतज्ञता
दर्शा सकेंगे। इस अनुरोध पर वेद व्यास ने आषाढ़ी
पूर्णिमा के दिन से 'ब्रह्मासूत्र' की रचना शुरू
की और तभी से इस दिन को व्यास पूर्णिमा
या गुरु पूर्णिमा के रूप में मनाया जाने लगा। गुरु वह है, जिसमें
आकर्षण हो, जिसके आभा मंडल में हम स्वयं को खिंचते हुए
महसूस करते हैं। जितना ज्यादा हम गुरु की ओर
आकर्षित होते हैं, उतनी ही ज्यादा
स्वाधीनता हमें मिलती जाती
है। कबीर, नानक, बुद्ध का स्मरण ऐसी
ही विचित्र अनुभूति का अहसास दिलाता है। गुरु के
प्रति समर्पण भाव का मतलब दासता से नहीं, बल्कि
इससे मुक्ति का भाव जागृत होता है। गुरु के मध्यस्थ बनते
ही हम आत्मज्ञान पाने लायक बनते हैं
जय गुरु देव !

ॐ जय सच्चिदानंद जी 


श्री हनुमान चालीसा


दोहा॥

श्रीगुरु चरन सरोज रज निज मनु मुकुरु सुधारि ।बरनउँ रघुबर बिमल जसु जो दायकु फल  चारि ॥

बुद्धिहीन तनु जानिके सुमिरौं पवन-कुमार ।
बल बुधि बिद्या देहु मोहिं हरहु कलेस बिकार ॥

॥चौपाई॥

जय हनुमान ज्ञान गुन सागर ।
जय कपीस तिहुँ लोक उजागर ॥१॥

राम दूत अतुलित बल धामा ।
अञ्जनि-पुत्र पवनसुत नामा ॥२॥

महाबीर बिक्रम बजरङ्गी ।
कुमति निवार सुमति के सङ्गी ॥३॥

कञ्चन बरन बिराज सुबेसा ।
कानन कुण्डल कुञ्चित केसा ॥४॥
हाथ बज्र औ ध्वजा बिराजै ।
काँधे मूँज जनेउ साजै ॥५॥

सङ्कर सुवन केसरीनन्दन ।
तेज प्रताप महा जग बन्दन ॥६॥
बिद्यावान गुनी अति चातुर ।
राम काज करिबे को आतुर ॥७॥

प्रभु चरित्र सुनिबे को रसिया ।
राम लखन सीता मन बसिया ॥८॥

सूक्ष्म रूप धरि सियहिं दिखावा ।
बिकट रूप धरि लङ्क जरावा ॥९॥

भीम रूप धरि असुर सँहारे ।
रामचन्द्र के काज सँवारे ॥१०॥

लाय सञ्जीवन लखन जियाये ।
श्रीरघुबीर हरषि उर लाये ॥११॥

रघुपति कीह्नी बहुत बड़ाई ।
तुम मम प्रिय भरतहि सम भाई ॥१२॥

सहस बदन तुह्मारो जस गावैं ।
अस कहि श्रीपति कण्ठ लगावैं ॥१३॥

सनकादिक ब्रह्मादि मुनीसा ।
नारद सारद सहित अहीसा ॥१४॥

जम कुबेर दिगपाल जहाँ ते ।
कबि कोबिद कहि सके कहाँ ते ॥१५॥

तुम उपकार सुग्रीवहिं कीह्ना ।
राम मिलाय राज पद दीह्ना ॥१६॥

तुह्मरो मन्त्र बिभीषन माना ।
लङ्केस्वर भए सब जग जाना ॥१७॥

जुग सहस्र जोजन पर भानु ।
लील्यो ताहि मधुर फल जानू ॥१८॥

प्रभु मुद्रिका मेलि मुख माहीं ।
जलधि लाँघि गये अचरज नाहीं ॥१९॥

दुर्गम काज जगत के जेते ।
सुगम अनुग्रह तुह्मरे तेते ॥२०॥

राम दुआरे तुम रखवारे ।
होत न आज्ञा बिनु पैसारे ॥२१॥

सब सुख लहै तुह्मारी सरना ।
तुम रच्छक काहू को डर ना ॥२२॥

आपन तेज सह्मारो आपै ।
तीनों लोक हाँक तें काँपै ॥२३॥

भूत पिसाच निकट नहिं आवै ।
महाबीर जब नाम सुनावै ॥२४॥

नासै रोग हरै सब पीरा ।
जपत निरन्तर हनुमत बीरा ॥२५॥

सङ्कट तें हनुमान छुड़ावै ।
मन क्रम बचन ध्यान जो लावै ॥२६॥

सब पर राम तपस्वी राजा ।
तिन के काज सकल तुम साजा ॥२७॥

और मनोरथ जो कोई लावै ।
सोई अमित जीवन फल पावै ॥२८॥

चारों जुग परताप तुह्मारा ।
है परसिद्ध जगत उजियारा ॥२९॥

साधु सन्त के तुम रखवारे ।
असुर निकन्दन राम दुलारे ॥३०॥

अष्टसिद्धि नौ निधि के दाता ।
अस बर दीन जानकी माता ॥३१॥

राम रसायन तुह्मरे पासा ।
सदा रहो रघुपति के दासा ॥३२॥

तुह्मरे भजन राम को पावै ।
जनम जनम के दुख बिसरावै ॥३३॥

अन्त काल रघुबर पुर जाई ।
जहाँ जन्म हरिभक्त कहाई ॥३४॥

और देवता चित्त न धरई ।
हनुमत सेइ सर्ब सुख करई ॥३५॥

सङ्कट कटै मिटै सब पीरा ।
जो सुमिरै हनुमत बलबीरा ॥३६॥

जय जय जय हनुमान गोसाईं ।
कृपा करहु गुरुदेव की नाईं ॥३७॥

जो सत बार पाठ कर कोई ।
छूटहि बन्दि महा सुख होई ॥३८॥

जो यह पढ़ै हनुमान चालीसा ।
होय सिद्धि साखी गौरीसा ॥३९॥

तुलसीदास सदा हरि चेरा ।
कीजै नाथ हृदय महँ डेरा ॥४०॥

॥दोहा॥

पवनतनय सङ्कट हरन मङ्गल मूरति रूप ।
राम लखन सीता सहित हृदय बसहु सुर भूप ॥

श्री गणेशजी की आरती


जय गणेश जय गणेश जय गणेश देवा।
माता जाकी पार्वती पिता महादेवा॥ x2

एकदन्त दयावन्त चारभुजाधारी
माथे पर तिलक सोहे मूसे की सवारी। x2
(माथे पर सिन्दूर सोहे, मूसे की सवारी)
पान चढ़े फूल चढ़े और चढ़े मेवा
(हार चढ़े, फूल चढ़े और चढ़े मेवा)
लड्डुअन का भोग लगे सन्त करें सेवा॥ x2

जय गणेश जय गणेश जय गणेश देवा।
माता जाकी पार्वती पिता महादेवा॥

अँधे को आँख देत कोढ़िन को काया
बाँझन को पुत्र देत निर्धन को माया। x2
'सूर' श्याम शरण आए सफल कीजे सेवा
माता जाकी पार्वती पिता महादेवा॥ x2
(दीनन की लाज राखो, शम्भु सुतवारी )
(कामना को पूर्ण करो, जग बलिहारी॥)

जय गणेश जय गणेश जय गणेश देवा।
माता जाकी पार्वती पिता महादेवा॥

108 Names of Sri Rama


ॐ श्रीरामाय नमः 
ॐ रामभद्राय नमः 
ॐ रामचंद्राय नमः 
ॐ शाश्वताय नमः 
ॐ राजीवलोचनाय नमः 
ॐ श्रीमते नमः 
ॐ राजेंद्राय नमः 
ॐ रघुपुङ्गवाय नमः 
ॐ जानकीवल्लभाय नमः 
ॐ जैत्राय नमः 
ॐ जितामित्राय नमः 
ॐ जनार्दनाय नमः 
ॐ विश्वामित्रप्रियाय नमः 
ॐ दांताय नमः 
ॐ शरणत्राणतत्पराय नमः 
ॐ वालिप्रमथनाय नमः 
ॐ वाग्मिने नमः 
ॐ सत्यवाचे नमः 
ॐ सत्यविक्रमाय नमः 
ॐ सत्यव्रताय नमः 
ॐ व्रतधराय नमः 
ॐ सदाहनुमदाश्रिताय नमः 
ॐ कौसलेयाय नमः 
ॐ खरध्वंसिने नमः 
ॐ विराधवधपंडिताय नमः 
ॐ विभीषणपरित्रात्रे नमः 
ॐ हरकोदण्डखण्डनाय नमः 
ॐ सप्ततालप्रभेत्रे नमः 
ॐ दशग्रीवशिरोहराय नमः 
ॐ जामदग्न्यमहादर्पदलनाय नमः 
ॐ ताटकांतकाय नमः 
ॐ वेदांतसाराय नमः 
ॐ वेदात्मने नमः 
ॐ भवरोगस्य भेषजाय नमः 
ॐ दूषणत्रिशिरोहंत्रे नमः 
ॐ त्रिमूर्तये नमः 
ॐ त्रिगुणात्मकाय नमः 
ॐ त्रिविक्रमाय नमः 
ॐ त्रिलोकात्मने नमः 
ॐ पुण्यचारित्रकीर्तनाय नमः 
ॐ त्रिलोकरक्षकाय नमः 
ॐ धन्विने नमः 
ॐ दंडकारण्यवर्तनाय नमः 
ॐ अहल्याशापविमोचनाय नमः 
ॐ पितृभक्ताय नमः 
ॐ वरप्रदाय नमः 
ॐ जितेंद्रियाय नमः 
ॐ जितक्रोधाय नमः 
ॐ जितमित्राय नमः 
ॐ जगद्गुरवे नमः 
ॐ ऋक्षवानरसङ्घातिने नमः 
ॐ चित्रकूटसमाश्रयाय नमः 
ॐ जयंतत्राणवरदाय नमः 
ॐ सुमित्रापुत्रसेविताय नमः 
ॐ सर्वदेवादिदेवाय नमः 
ॐ मृतवानरजीवनाय नमः 
ॐ मायामारीचहंत्रे नमः 
ॐ महादेवाय नमः 
ॐ महाभुजाय नमः 
ॐ सर्वदेवस्तुताय नमः 
ॐ सौम्याय नमः 
ॐ ब्रह्मण्याय नमः 
ॐ मुनिसंस्तुताय नमः 
ॐ महायोगिने नमः 
ॐ महोदराय नमः 
ॐ सुग्रीवेप्सितराज्यदाय नमः 
ॐ सर्वपुण्याधिकफलाय नमः 
ॐ स्मृतसर्वौघनाशनाय नमः 
ॐ आदिपुरुषाय नमः 
ॐ परमपुरुषाय नमः 
ॐ महापुरुषाय नमः 
ॐ पुण्योदयाय नमः 
ॐ दयासाराय नमः 
ॐ पुराणपुरुषोत्तमाय नमः 
ॐ स्मितवक्त्राय नमः 
ॐ मितभाषिणे नमः 
ॐ पूर्वभाषिणे नमः 
ॐ राघवाय नमः 
ॐ अनंतगुणगंभीराय नमः 
ॐ धीरोदात्तगुणोत्तमाय नमः 
ॐ मायामानुषचारित्राय नमः 
ॐ महादेवादिपूजिताय नमः 
ॐ सेतुकृते नमः 
ॐ जितवाराशये नमः 
ॐ सर्वतीर्थमयाय नमः 
ॐ हरये नमः 
ॐ श्यामाङ्गाय नमः 
ॐ सुंदराय नमः 
ॐ शूराय नमः 
ॐ पीतवाससे नमः 
ॐ धनुर्धराय नमः 
ॐ सर्वयज्ञाधिपाय नमः 
ॐ यज्विने नमः 
ॐ जरामरणवर्जिताय नमः 
ॐ शिवलिङ्गप्रतिष्ठात्रे नमः 
ॐ सर्वापगुणवर्जिताय नमः 
ॐ परमात्मने नमः 
ॐ परब्रह्मणे नमः 
ॐ सच्चिदानंदविग्रहाय नमः 
ॐ परंज्योतिषे नमः 
ॐ परंधाम्ने नमः 
ॐ पराकाशाय नमः 
ॐ परात्पराय नमः 
ॐ परेशाय नमः 
ॐ पारगाय नमः 
ॐ पाराय नमः 
ॐ सर्वदेवात्मकाय नमः 
ॐ परस्मै नमः 
इति श्रीरामाष्टोत्तरशतनामावलिस्समाप्ता 

!!!۞!!! ॥ॐ श्री राम ॥ !!!۞!!! 
!!!۞!!! ॥ॐ श्री हनुमते नमः ॥ !!!۞!!!

हिंदू पत्थर को क्यों पूजते हैं ?


एक बार कृष्ण जी ने पत्थर उठा कर
गोकुल
धाम को प्रलय से बचाया....
एक बार पत्थर ला कर हनुमान जी ने लक्ष्मण जी
के प्राण बचाये....
एक बार हनुमान जी ने पत्थर पर राम नाम
लिख कर समुद्र में तैराये....
रामसेतु बना लंका पहुँचाया....
एक बार पत्थर ने ही हमारा केदार नाथ बचाया....
फ़िर भी तमाम मूर्ख हम से पूछते हैं कि
तुम हिंदू "पत्थर" क्यों पूजते हो....
||जय श्री राम ||


शिव पंचाक्षर स्त्रोत


नागेंद्रहाराय त्रिलोचनाय भस्मांग रागाय महेश्वराय| 
नित्याय शुद्धाय दिगंबराय तस्मे "न" काराय नमः शिवायः॥
हे महेश्वर! आप नागराज को हार स्वरूप धारण करने वाले हैं। हे (तीन नेत्रों वाले) त्रिलोचन आप भष्म से अलंकृत, नित्य (अनादि एवं अनंत) एवं शुद्ध हैं। अम्बर को वस्त्र सामान धारण करने वाले दिग्म्बर शिव, आपके न् अक्षर द्वारा जाने वाले स्वरूप को नमस्कार ।

मंदाकिनी सलिल चंदन चर्चिताय नंदीश्वर प्रमथनाथ महेश्वराय| 
मंदारपुष्प बहुपुष्प सुपूजिताय तस्मे "म" काराय नमः शिवायः॥चन्दन से अलंकृत, एवं गंगा की धारा द्वारा शोभायमान नन्दीश्वर एवं प्रमथनाथ के स्वामी महेश्वर आप सदा मन्दार पर्वत एवं बहुदा अन्य स्रोतों से प्राप्त्य पुष्पों द्वारा पुजित हैं। हे म् स्वरूप धारी शिव, आपको नमन है। 

शिवाय गौरी वदनाब्जवृंद सूर्याय दक्षाध्वरनाशकाय| 
श्री नीलकंठाय वृषभद्धजाय तस्मै "शि" काराय नमः शिवायः॥हे धर्म ध्वज धारी, नीलकण्ठ, शि अक्षर द्वारा जाने जाने वाले महाप्रभु, आपने ही दक्ष के दम्भ यज्ञ का विनाश किया था। माँ गौरी के कमल मुख को सूर्य सामान तेज प्रदान करने वाले शिव, आपको नमस्कार है। 

वषिष्ठ कुभोदव गौतमाय मुनींद्र देवार्चित शेखराय| 
चंद्रार्क वैश्वानर लोचनाय तस्मै "व" काराय नमः शिवायः॥देवगणो एवं वषिष्ठ, अगस्त्य, गौतम आदि मुनियों द्वार पुजित देवाधिदेव! सूर्य, चन्द्रमा एवं अग्नि आपके तीन नेत्र सामन हैं। हे शिव आपके व् अक्षर द्वारा विदित स्वरूप कोअ नमस्कार है। 

यज्ञस्वरूपाय जटाधराय पिनाकस्ताय सनातनाय| 
दिव्याय देवाय दिगंबराय तस्मै "य" काराय नमः शिवायः॥
हे यज्ञस्वरूप, जटाधारी शिव आप आदि, मध्य एवं अंत रहित सनातन हैं। हे दिव्य अम्बर धारी शिव आपके शि अक्षर द्वारा जाने जाने वाले स्वरूप को नमस्कारा है। 

पंचाक्षरमिदं पुण्यं यः पठेत शिव सन्निधौ| 
शिवलोकं वाप्नोति शिवेन सह मोदते॥
जो कोई शिव के इस पंचाक्षर मंत्र का नित्य ध्यान करता है वह शिव के पून्य लोक को प्राप्त करता है तथा शिव के साथ सुख पुर्वक निवास करता है।