शनिदेव जी की आरती
सूरज के पुत्र प्रभु छाया महतारी ॥
जय जय श्री शनिदेव…
श्याम अंक वक्र दृष्ट चतुर्भुजा धारी ।
नीलांबर धार नाथ गज की असवारी ॥
जय जय श्री शनिदेव…
किरीट मुकुट शीश सहज दिपत है लिलारी ।
मुक्तन की माल गले शोभित बलिहारी ॥
जय जय श्री शनिदेव…
मोदक मिष्ठान पान चढ़त हैं सुपारी ।
लोहा तिल तेल उड़द महिषी अति प्यारी ॥
जय जय श्री शनिदेव…
देव दनुज ॠषि मुनि सुरत नर नारी ।
विश्वनाथ धरत ध्यान शरण हैं तुम्हारी ॥
जय जय श्री शनिदेव…
गुरु-शिष्य परंपरा
संत कबीर ने गुरु के लिए कहा है कि,
गुरु गोबिन्द दोउ खडे काके लागूँ पाँय,
बलिहारी गुरु आपने गोबिन्द दियो बताय।
इसका मतलब यह है कि गुरु और ईश्वर दोनों साथ
ही खड़े हैं इसलिए पहले किस के पैर छूने हैं
ऐसी दुविधा आए तब पहले गुरु को वंदन करें
क्युंकि उनकी वजह से ही ईश्वर
के दर्शन हुए हैं। उनके बगैर ईश्वर तक पहुँचना
असंभव है।
कबीरजी का एक दूसरा प्रचलित
दोहा है,
कबीरा ते नर अंध है गुरु को कहते और
हरि रूठे गुरु ठौर है गुरु रूठे नही ठौर
यानि की अंधा है वह जो गुरु को
नहीं समझ पाता। अगर ईश्वर नाराज़ हो जाए तो
गुरु बचा सकता है, लेकिन अगर गुरु नाराज़ हो जाए तब कौन
बचाएगा।
गुरु पूर्णिमा कैसे शुरू हुई ?
ॐ जय सच्चिदानंद जी ॐ
ऋषियों और देवताओं ने महर्षि व्यास से अनुरोध किया था कि जिस
तरह सभी देवी-देवताओं की
पूजा के लिए कोई न कोई दिन निर्धारित है उसी तरह
गुरुओं और महापुरुषों की अर्चना के लिए
भी एक दिन निश्चित होना चाहिए। इससे
सभी शिष्य और साधक अपने गुरुओं के प्रति कृतज्ञता
दर्शा सकेंगे। इस अनुरोध पर वेद व्यास ने आषाढ़ी
पूर्णिमा के दिन से 'ब्रह्मासूत्र' की रचना शुरू
की और तभी से इस दिन को व्यास पूर्णिमा
या गुरु पूर्णिमा के रूप में मनाया जाने लगा। गुरु वह है, जिसमें
आकर्षण हो, जिसके आभा मंडल में हम स्वयं को खिंचते हुए
महसूस करते हैं। जितना ज्यादा हम गुरु की ओर
आकर्षित होते हैं, उतनी ही ज्यादा
स्वाधीनता हमें मिलती जाती
है। कबीर, नानक, बुद्ध का स्मरण ऐसी
ही विचित्र अनुभूति का अहसास दिलाता है। गुरु के
प्रति समर्पण भाव का मतलब दासता से नहीं, बल्कि
इससे मुक्ति का भाव जागृत होता है। गुरु के मध्यस्थ बनते
ही हम आत्मज्ञान पाने लायक बनते हैं
जय गुरु देव !
ॐ जय सच्चिदानंद जी ॐ
श्री हनुमान चालीसा
जय हनुमान ज्ञान गुन सागर ।
जय कपीस तिहुँ लोक उजागर ॥१॥
राम दूत अतुलित बल धामा ।
अञ्जनि-पुत्र पवनसुत नामा ॥२॥
महाबीर बिक्रम बजरङ्गी ।
कुमति निवार सुमति के सङ्गी ॥३॥
कञ्चन बरन बिराज सुबेसा ।
कानन कुण्डल कुञ्चित केसा ॥४॥
काँधे मूँज जनेउ साजै ॥५॥
सङ्कर सुवन केसरीनन्दन ।
तेज प्रताप महा जग बन्दन ॥६॥
राम काज करिबे को आतुर ॥७॥
प्रभु चरित्र सुनिबे को रसिया ।
राम लखन सीता मन बसिया ॥८॥
सूक्ष्म रूप धरि सियहिं दिखावा ।
बिकट रूप धरि लङ्क जरावा ॥९॥
भीम रूप धरि असुर सँहारे ।
रामचन्द्र के काज सँवारे ॥१०॥
लाय सञ्जीवन लखन जियाये ।
श्रीरघुबीर हरषि उर लाये ॥११॥
रघुपति कीह्नी बहुत बड़ाई ।
तुम मम प्रिय भरतहि सम भाई ॥१२॥
सहस बदन तुह्मारो जस गावैं ।
अस कहि श्रीपति कण्ठ लगावैं ॥१३॥
सनकादिक ब्रह्मादि मुनीसा ।
नारद सारद सहित अहीसा ॥१४॥
जम कुबेर दिगपाल जहाँ ते ।
कबि कोबिद कहि सके कहाँ ते ॥१५॥
तुम उपकार सुग्रीवहिं कीह्ना ।
राम मिलाय राज पद दीह्ना ॥१६॥
तुह्मरो मन्त्र बिभीषन माना ।
लङ्केस्वर भए सब जग जाना ॥१७॥
जुग सहस्र जोजन पर भानु ।
लील्यो ताहि मधुर फल जानू ॥१८॥
प्रभु मुद्रिका मेलि मुख माहीं ।
जलधि लाँघि गये अचरज नाहीं ॥१९॥
दुर्गम काज जगत के जेते ।
सुगम अनुग्रह तुह्मरे तेते ॥२०॥
राम दुआरे तुम रखवारे ।
होत न आज्ञा बिनु पैसारे ॥२१॥
सब सुख लहै तुह्मारी सरना ।
तुम रच्छक काहू को डर ना ॥२२॥
आपन तेज सह्मारो आपै ।
तीनों लोक हाँक तें काँपै ॥२३॥
भूत पिसाच निकट नहिं आवै ।
महाबीर जब नाम सुनावै ॥२४॥
नासै रोग हरै सब पीरा ।
जपत निरन्तर हनुमत बीरा ॥२५॥
सङ्कट तें हनुमान छुड़ावै ।
मन क्रम बचन ध्यान जो लावै ॥२६॥
सब पर राम तपस्वी राजा ।
तिन के काज सकल तुम साजा ॥२७॥
और मनोरथ जो कोई लावै ।
सोई अमित जीवन फल पावै ॥२८॥
चारों जुग परताप तुह्मारा ।
है परसिद्ध जगत उजियारा ॥२९॥
साधु सन्त के तुम रखवारे ।
असुर निकन्दन राम दुलारे ॥३०॥
अष्टसिद्धि नौ निधि के दाता ।
अस बर दीन जानकी माता ॥३१॥
राम रसायन तुह्मरे पासा ।
सदा रहो रघुपति के दासा ॥३२॥
तुह्मरे भजन राम को पावै ।
जनम जनम के दुख बिसरावै ॥३३॥
अन्त काल रघुबर पुर जाई ।
जहाँ जन्म हरिभक्त कहाई ॥३४॥
और देवता चित्त न धरई ।
हनुमत सेइ सर्ब सुख करई ॥३५॥
सङ्कट कटै मिटै सब पीरा ।
जो सुमिरै हनुमत बलबीरा ॥३६॥
जय जय जय हनुमान गोसाईं ।
कृपा करहु गुरुदेव की नाईं ॥३७॥
जो सत बार पाठ कर कोई ।
छूटहि बन्दि महा सुख होई ॥३८॥
जो यह पढ़ै हनुमान चालीसा ।
होय सिद्धि साखी गौरीसा ॥३९॥
तुलसीदास सदा हरि चेरा ।
कीजै नाथ हृदय महँ डेरा ॥४०॥
॥दोहा॥
पवनतनय सङ्कट हरन मङ्गल मूरति रूप ।
राम लखन सीता सहित हृदय बसहु सुर भूप ॥




