सावन के आरंभ से लेकर अंत तक करे ये पांच उपाए बढ़ेगी आयु और धन


भगवान शिव योगेश्वर हैं। निरंतर समाधि में लीन रहते हैं, लेकिन सम्पूर्ण जगत का उन्हें ज्ञान रहता है। वह परम तपस्वी हैं, योगी हैं। उनकी पूजा-उपासना व आराधना प्रकृति व परमेश्वर की पूजा-आराधना है। ऐसा वेद-पुराणों में उल्लेख है कि भगवान शिव अपनी पूजा-उपासना से शीघ्र प्रसन्न होते हैं। इसका तात्पर्य यह भी है कि पूजा-उपासना शुभ कर्म है जिसके माध्यम से हम स्थिर-एकाग्र होते हैं।

भगवान को शुभ कर्म अच्छे लगते हैं इसलिए पुरस्कार स्वरूप भगवान अपने भक्तों को अनुदान देते हैं कि वे अपने जीवन में निरंतर शुभ कर्म करते रहें। सावन महीने के पावन दिनों में भगवान शिव की पूजा-अर्चना के पीछे यही संदेश हम सबके लिए है कि यदि हम जीवन में शुभ कर्म करें तब ही हम कल्याणकारी शिव के प्रिय बन सकेंगे। इसके अतिरिक्त सावन के आरंभ से लेकर अंत तक करें ये पांच उपाय बढ़ेगी आयु और धन-

* भगवान शिव की पूजा और अभिषेक में बिल्वपत्र का प्रथम स्थान है। चतुर्थी, अष्टमी, नवमी, अमावस्या, संक्रांति और सोमवार को बिल्वपत्र न तोड़ने के नियम के कारण बिल्वपत्र न होने पर नए बिल्वपत्रों की जगह पर पुराने बिल्वपत्रों को जल से पवित्र कर भगवान शिव पर चढ़ाया जा सकता है या इन तिथियों से पहले तोड़ा बिल्वपत्र चढ़ाएं।

* प्रतिदिन रुद्राष्टाध्यायी का पाठ करें अथवा शिव षडक्षरी मंत्र 'ओम नमः शिवाय' का मन ही मन सारा महीना जाप करें।

* सुबह के समय पंचामृत (दूध, गंगाजल, शहद, दही और घी) से भगवान शिव का अभिषेक करें।

* स्फटिक का शिवलिंग घर में स्थापित कर नियमित रूप से उनका पूजन करें।

* शाम के समय मंदिर में तेल का दीया जलाएं। धूप-दीप जलाकर प्रेमपूर्वक शिव और मां पार्वती की आरती करें।

क्यों हुआ अर्धनारीश्वर अवतार?


शिवपुराण के अनुसार सृष्टि में प्रजा की वृद्धि न होने पर ब्रह्माजी ने तपस्या कर भगवान शिव को प्रसन्न किया। ब्रह्मा की तपस्या से परमात्मा शिव संतुष्ट हो अर्धनारीश्वर का रूप धारण कर उनके समीप गए और जगत कल्याण के लिए शिव ने अपने शरीर में स्थित देवी शिवा/शक्ति के अंश को पृथक कर दिया। ब्रह्मा ने उस परम शक्ति की स्तुति की और कहा- माता। मैं मैथुनी सृष्टि उत्पन्न कर अपनी प्रजा की वृद्धि करना चाहता हूं अत: आप मुझे नारीकुल की सृष्टि करने की शक्ति प्रदान करें।

ब्रह्माजी की प्रार्थना स्वीकार कर देवी शिवा ने उन्हें स्त्री-सर्ग-शक्ति प्रदान की और अपनी ललाट के मध्य से अपने ही समान कांति वाली एक शक्ति की सृष्टिï की जिसने दक्ष के घर उनकी पुत्री के रूप में जन्म लिया। शक्ति का यह अवतार आंशिक कहा गया है। शक्ति पुन: शिव के शरीर में प्रविष्ट हो गई। उसी समय से मैथुनी सृष्टि का प्रारंभ हुआ। तभी से बराबर प्रजा की वृद्धि होने लगी।

सावन के सोमवार-व्रत की कथा और पूजन विधि


सावन का पूरा महीना यूं तो भगवान शिव को अर्पित होता ही है पर सावन के पहले सोमवार को भगवान शिव की पूजा करने से विशेष फल मिलता है. भारत के सभी द्वादश शिवलिंगों पर इस दिन विशेष पूजा-अर्चना की जाती है. आदिकाल से ही इस दिन का विशेष महत्व रहा है. कहा जाता है सावन के सोमवार का व्रत करने से मनचाहा जीवनसाथी मिलता है और दूध की धार के साथ भगवान शिव से जो मांगो वह वर मिल जाता है.

आइए जानें सावन के सोमवार के व्रत की कथा 
एक कथा के अनुसार जब सनत कुमारों ने महादेव से उन्हें सावन महीना प्रिय होने का कारण पूछा तो महादेव भगवान शिव ने बताया कि जब देवी सती ने अपने पिता दक्ष के घर में योगशक्ति से शरीर त्याग किया था, उससे पहले देवी सती ने महादेव को हर जन्म में पति के रूप में पाने का प्रण किया था. अपने दूसरे जन्म में देवी सती ने पार्वती के नाम से हिमाचल और रानी मैना के घर में पुत्री के रूप में जन्म लिया. पार्वती ने सावन के महीने में निराहार रह कर कठोर व्रत किया और उन्हें प्रसन्न कर विवाह किया, जिसके बाद ही महादेव के लिए यह विशेष हो गया. यही कारण है कि सावन के महीने में सुयोग्य वर की प्राप्ति के लिए कुंवारी लड़कियों व्रत रखती हैं.

सोमवार व्रत विधि
सोमवार व्रत में भगवान भगवान शंकर के साथ माता पार्वती और श्री गणेश की भी पूजा की जाती है. व्रती यथाशक्ति पंचोपचार या षोडशोपचार विधि-विधान और पूजन सामग्री से पूजा कर सकता है. व्रत स्त्री-पुरुष दोनों कर सकते हैं. शास्त्रों के मुताबिक सोमवार व्रत की अवधि सूर्योदय से लेकर सूर्यास्त तक है. सोमवार व्रत में उपवास रखना श्रेष्ठ माना जाता है, किंतु उपवास न करने की स्थिति में व्रती के लिए सूर्यास्त के बाद शिव पूजा के बाद एक बार भोजन करने का विधान है. सोमवार व्रत एक भुक्त और रात्रि भोजन के कारण नक्तव्रत भी कहलाता है. 

सावन के पहले सोमवार की पूजा विधि 
प्रात: और सांयकाल स्नान के बाद शिव के साथ माता पार्वती, गणेश जी, कार्तिकेय और नंदी जी पूजा करें. चतुर्थी तिथि होने से श्री गणेश की भी विशेष पूजा करें. पूजा में मुख पूर्व दिशा या उत्तर दिशा की ओर रखें. पूजा के दौरान शिव के पंचाक्षरी मंत्र ॐ नम: शिवायऔर गणेश मंत्र जैसे ॐ गं गणपतये बोलकर भी पूजा सामग्री अर्पित कर सकते हैं. पूजा में शिव परिवार को पंचामृत यानी दूध, दही, शहद, शक्कर, घी व जलधारा से स्नान कराकर, गंध, चंदन, फूल, रोली, वस्त्र अर्पित करें. शिव को सफेद फूल, बिल्वपत्र, सफेद वस्त्र और श्री गणेश को सिंदूर, दूर्वा, गुड़ व पीले वस्त्र चढ़ाएं. भांग-धतूरा भी शिव पूजा में चढ़ाएं. शिव को सफेद रंगे के पकवानों और गणेश को मोदक यानी लड्डूओं का भोग लगाएं. भगवान शिव व गणेश के जिन स्त्रोतों, मंत्र और स्तुति की जानकारी हो, उसका पाठ करें. श्री गणेश व शिव की आरती सुगंधित धूप, घी के पांच बत्तियों के दीप और कर्पूर से करें. अंत में गणेश और शिव से घर-परिवार की सुख-समृद्धि की कामनाएं करें. 

आखिर क्यों श्री गणेश जी की पूजा पर तुलसी अर्पित नहीं की जाती ?


भगवान गणेश की पूजा के बिना दुनिया का कोई भी कार्य पूरा नहीं होता. श्री गणेश का पूर्ण जीवन ही रोचक घटनाओं से भरा है और इसी में से एक है कि आखिर क्यूं श्री गणेश जी की पूजा पर तुलसी अर्पित नहीं की जाती. प्राय: पूजा-अर्चना में भगवान को तुलसी चढ़ाना बहुत पवित्र माना जाता है। व्यावहारिक दृष्टि से भी तुलसी को औषधीय गुणों वाला पौधा माना जाता है। किंतु भगवान गणेश की पूजा में पवित्र तुलसी का प्रयोग निषेध माना गया है। इस संबंध में एक पौराणिक कथा है - एक बार श्री गणेश गंगा किनारे तप कर रहे थे। तभी विवाह की इच्छा से तीर्थ यात्रा पर निकली देवी तुलसी वहां पहुंची। वह श्री गणेश के रुप पर मोहित हो गई। तुलसी ने विवाह की इच्छा से उनका ध्यान भंग किया। तब भगवान श्री गणेश ने तुलसी द्वारा तप भंग करने को अशुभ बताया और तुलसी की मंशा जानकर स्वयं को ब्रह्मचारी बताकर उसके विवाह प्रस्ताव को नकार दिया। इस बात से दु:खी तुलसी ने श्री गणेश के दो विवाह होने का शाप दिया। इस श्री गणेश ने भी तुलसी को शाप दे दिया कि तुम्हारी संतान असुर होगी। एक राक्षस की मां होने का शाप सुनकर तुलसी ने श्री गणेश से माफी मांगी। तब श्री गणेश ने तुलसी से कहा कि तुम्हारी संतान शंखचूर्ण राक्षस होगा। किंतु फिर तुम भगवान विष्णु और श्रीकृष्ण को प्रिय होने के साथ ही कलयुग में जगत के लिए जीवन और मोक्ष देने वाली होगी। पर मेरी पूजा में तुलसी चढ़ाना शुभ नहीं माना जाएगा।
तब से ही भगवान श्री गणेश जी की पूजा में तुलसी वर्जित मानी जाती है।

कैसे हुई नागो की उत्पत्ति, जानिए पुराणो में वर्णित नागो के बारे में


हमारे धर्म ग्रंथो में शेषनाग, वासुकि नाग, तक्षक नाग, कर्कोटक नाग, धृतराष्ट्र नाग, कालिया नाग आदि नागो का वर्णन मिलता है। आज हम आपको इस लेख में इन सभी नागो के बारे में विस्तार से बताएंगे। लेकिन सबसे पहले हम आपको इन पराकर्मी नागों के पृथ्वी पर जन्म लेने से सम्बंधित पौराणिक कहानी सुनाते है।

इन नागो से सम्बंधित यह कथा पृथ्वी के आदि काल से सम्बंधित है। इसका वर्णन वेदव्यास जी ने भी महाभारत के आदि पर्व में किया है। महाभारत के आदि पर्व में इसका वर्णन होने के कारण लोग इसे महाभारत काल की घटना समझते है, लेकिन ऐसा नहीं है। महाभारत के आदि काल में कई ऐसी घटनाओं का वर्णन है जो की महाभारत काल से बहुत पहले घटी थी लेकिन उन घटनाओ का संबंध किसी न किसी तरीके से महाभारत से जुड़ता है, इसलिए उनका वर्णन महाभारत के आदि पर्व में किया गया है।


नागो की उत्पत्ति :
कद्रू और विनता दक्ष प्रजापति की पुत्रियाँ थीं और दोनों कश्यप ऋषि को ब्याही थीं। एक बार कश्यप मुनि ने प्रसन्न होकर अपनी दोनों पत्नियों से वरदान माँगने को कहा। कद्रू ने एक सहस्र पराक्रमी सर्पों की माँ बनने की प्रार्थना की और विनता ने केवल दो पुत्रों की किन्तु दोनों पुत्र कद्रू के पुत्रों से अधिक शक्तिशाली पराक्रमी और सुन्दर हों। कद्रू ने 1000 अंडे दिए और विनता ने दो। समय आने पर कद्रू के अंडों से 1000 सर्पों का जन्म हुआ। (यदि आप और पौराणिक कहानियाँ पढ़ना चाहे तो यहाँ पढ़े - पौराणिक कथाओं का विशाल संग्रह )

पुराणों में कई नागो खासकर वासुकी, शेष, पद्म, कंबल, कार कोटक, नागेश्वर, धृतराष्ट्र, शंख पाल, कालाख्य, तक्षक, पिंगल, महा नाग आदि का काफी वर्णन मिलता है।

शेषनाग (Sheshnaag) :

कद्रू के बेटों में सबसे पराक्रमी शेषनाग थे। इनका एक नाम अनन्त भी है। शेषनाग ने जब देखा कि उनकी माता व भाइयों ने मिलकर विनता के साथ छल किया है तो उन्होंने अपनी मां और भाइयों का साथ छोड़कर गंधमादन पर्वत पर तपस्या करनी आरंभ की। उनकी तपस्या से प्रसन्न होकर ब्रह्मा ने उन्हें वरदान दिया कि तुम्हारी बुद्धि कभी धर्म से विचलित नहीं होगी।

ब्रह्मा ने शेषनाग को यह भी कहा कि यह पृथ्वी निरंतर हिलती-डुलती रहती है, अत: तुम इसे अपने फन पर इस प्रकार धारण करो कि यह स्थिर हो जाए। इस प्रकार शेषनाग ने संपूर्ण पृथ्वी को अपने फन पर धारण कर लिया। क्षीरसागर में भगवान विष्णु शेषनाग के आसन पर ही विराजित होते हैं। धर्म ग्रंथों के अनुसार भगवान श्रीराम के छोटे भाई लक्ष्मण व श्रीकृष्ण के बड़े भाई बलराम शेषनाग के ही अवतार थे।

वासुकि नाग (Vasuki Nag) :

धर्म ग्रंथों में वासुकि को नागों का राजा बताया गया है। ये भी महर्षि कश्यप व कद्रू की संतान थे। इनकी पत्नी का नाम शतशीर्षा है। इनकी बुद्धि भी भगवान भक्ति में लगी रहती है। जब माता कद्रू ने नागों को सर्प यज्ञ में भस्म होने का श्राप दिया तब नाग जाति को बचाने के लिए वासुकि बहुत चिंतित हुए। तब एलापत्र नामक नाग ने इन्हें बताया कि आपकी बहन जरत्कारु से उत्पन्न पुत्र ही सर्प यज्ञ रोक पाएगा।

तब नागराज वासुकि ने अपनी बहन जरत्कारु का विवाह ऋषि जरत्कारु से करवा दिया। समय आने पर जरत्कारु ने आस्तीक नामक विद्वान पुत्र को जन्म दिया। आस्तीक ने ही प्रिय वचन कह कर राजा जनमेजय के सर्प यज्ञ को बंद करवाया था। धर्म ग्रंथों के अनुसार समुद्रमंथन के समय नागराज वासुकी की नेती बनाई गई थी। त्रिपुरदाह के समय वासुकि शिव धनुष की डोर बने थे।

तक्षक नाग (Takshak Nag) :

धर्म ग्रंथों के अनुसार तक्षक पातालवासी आठ नागों में से एक है। तक्षक के संदर्भ में महाभारत में वर्णन मिलता है। उसके अनुसार श्रृंगी ऋषि के शाप के कारण तक्षक ने राजा परीक्षित को डसा था, जिससे उनकी मृत्यु हो गयी थी। तक्षक से बदला लेने के उद्देश्य से राजा परीक्षित के पुत्र जनमेजय ने सर्प यज्ञ किया था। इस यज्ञ में अनेक सर्प आ-आकर गिरने लगे। यह देखकर तक्षक देवराज इंद्र की शरण में गया।

जैसे ही ऋत्विजों (यज्ञ करने वाले ब्राह्मण) ने तक्षक का नाम लेकर यज्ञ में आहुति डाली, तक्षक देवलोक से यज्ञ कुंड में गिरने लगा। तभी आस्तीक ऋषि ने अपने मंत्रों से उन्हें आकाश में ही स्थिर कर दिया। उसी समय आस्तीक मुनि के कहने पर जनमेजय ने सर्प यज्ञ रोक दिया और तक्षक के प्राण बच गए। ग्रंथों के अनुसार तक्षक ही भगवान शिव के गले में लिपटा रहता है।

कर्कोटक नाग (Karkotaka Naga) :

कर्कोटक शिव के एक गण हैं। पौराणिक कथाओं के अनुसार सर्पों की मां कद्रू ने जब नागों को सर्प यज्ञ में भस्म होने का श्राप दिया तब भयभीत होकर कंबल नाग ब्रह्माजी के लोक में, शंखचूड़ मणिपुर राज्य में, कालिया नाग यमुना में, धृतराष्ट्र नाग प्रयाग में, एलापत्र ब्रह्मलोक में और अन्य कुरुक्षेत्र में तप करने चले गए।

ब्रह्माजी के कहने पर कर्कोटक नाग ने महाकाल वन में महामाया के सामने स्थित लिंग की स्तुति की। शिव ने प्रसन्न होकर कहा कि- जो नाग धर्म का आचरण करते हैं, उनका विनाश नहीं होगा। इसके उपरांत कर्कोटक नाग उसी शिवलिंग में प्रविष्ट हो गया। तब से उस लिंग को कर्कोटेश्वर कहते हैं। मान्यता है कि जो लोग पंचमी, चतुर्दशी और रविवार के दिन कर्कोटेश्वर शिवलिंग की पूजा करते हैं उन्हें सर्प पीड़ा नहीं होती।

धृतराष्ट्र नाग (Dhritarashtra Naga) :

धर्म ग्रंथों के अनुसार धृतराष्ट्र नाग को वासुकि का पुत्र बताया गया है। महाभारत के युद्ध के बाद जब युधिष्ठिर ने अश्वमेध यज्ञ किया तब अर्जुन व उसके पुत्र ब्रभुवाहन (चित्रांगदा नामक पत्नी से उत्पन्न) के बीच भयंकर युद्ध हुआ। इस युद्ध में ब्रभुवाहन ने अर्जुन का वध कर दिया। ब्रभुवाहन को जब पता चला कि संजीवन मणि से उसके पिता पुन: जीवित हो जाएंगे तो वह उस मणि के खोज में निकला।

वह मणि शेषनाग के पास थी। उसकी रक्षा का भार उन्होंने धृतराष्ट्र नाग को सौंप था। ब्रभुवाहन ने जब धृतराष्ट्र से वह मणि मागी तो उसने देने से इंकार कर दिया। तब धृतराष्ट्र एवं ब्रभुवाहन के बीच भयंकर युद्ध हुआ और ब्रभुवाहन ने धृतराष्ट्र से वह मणि छीन ली। इस मणि के उपयोग से अर्जुन पुनर्जीवित हो गए।

कालिया नाग (Kaliya Naag) :

श्रीमद्भागवत के अनुसार कालिया नाग यमुना नदी में अपनी पत्नियों के साथ निवास करता था। उसके जहर से यमुना नदी का पानी भी जहरीला हो गया था। श्रीकृष्ण ने जब यह देखा तो वे लीलावश यमुना नदी में कूद गए। यहां कालिया नाग व भगवान श्रीकृष्ण के बीच भयंकर युद्ध हुआ। अंत में श्रीकृष्ण ने कालिया नाग को पराजित कर दिया। तब कालिया नाग की पत्नियों ने श्रीकृष्ण से कालिया नाग को छोडऩे के लिए प्रार्थना की। तब श्रीकृष्ण ने उनसे कहा कि तुम सब यमुना नदी को छोड़कर कहीं ओर निवास करो। श्रीकृष्ण के कहने पर कालिया नाग परिवार सहित यमुना नदी छोड़कर कहीं ओर चला गया।

Zindagi Ka Sach ( सत्य कथा )

एक बार की बात है एक नगर के राजा ने यह घोषणा करवा दी कि कल जब मेरे महल का मुख्य दरवाज़ा खोला जायेगा तब जिस व्यक्ति ने जिस वस्तु को हाथ लगा दिया वह वस्तु उसकी हो जाएगी ! इस घोषणा को सुनकर सभी नगरवासी रात को ही नगर के दरवाज़े पर बैठ गए और सुबह होने का इंतजार करने लगे ! सब लोग आपस में बातचीत करने लगे कि मैं अमुक वस्तु को हाथ लगाऊंगा ! कुछ लोग कहने लगे मैं तो स्वर्ण को हाथ लगाऊंगा , कुछ लोग कहने लगे कि मैं कीमती जेवरात को हाथ लगाऊंगा, कुछ लोग घोड़ों के शौक़ीन थे और कहने लगे कि मैं तो घोड़ों को हाथ लगाऊंगा , कुछ लोग हाथीयों को हाथ लगाने की बात कर रहे थे , कुछ लोग कह रहे थे कि मैं दुधारू गौओं को हाथ लगाऊंगा , कुछ लोग कह रहे थे कि राजा की रानियाँ बहुत सुन्दर है मैं राजा की रानीयों को हाथ लगाऊंगा , कुछ लोग राजकुमारी को हाथ लगाने की बात कर रहे थे ! कल्पना कीजिये कैसा अद्भुत दृश्य होगा वह !!
उसी वक्त महल का मुख्य दरवाजा खुला और सब लोग अपनी अपनी मनपसंद वस्तु को हाथ लगाने दौड़े ! सबको इस बात की जल्दी थी कि पहले मैं अपनी मनपसंद वस्तु को हाथ लगा दूँ ताकि वह वस्तु हमेशा के लिए मेरी हो जाएँ और सबके मन में यह डर भी था कि कहीं मुझ से पहले कोई दूसरा मेरी मनपसंद वस्तु को हाथ ना लगा दे !
राजा अपने सिंघासन पर बैठा सबको देख रहा था और अपने आस-पास हो रही भाग दौड़ को देखकर मुस्कुरा रहा था ! कोई किसी वस्तु को हाथ लगा रहा था और कोई किसी वस्तु को हाथ लगा रहा था ! उसी समय उस भीड़ में से एक छोटी सी लड़की आई और राजा की तरफ बढ़ने लगी ! राजा उस लड़की को देखकर सोच में पढ़ गया और फिर विचार करने लगा कि यह लड़की बहुत छोटी है शायद यह मुझसे कुछ पूछने आ रही है ! वह लड़की धीरे धीरे चलती हुई राजा के पास पहुंची और उसने अपने नन्हे हाथों से राजा को हाथ लगा दिया ! राजा को हाथ लगाते ही राजा उस लड़की का हो गया और राजा की प्रत्येक वस्तु भी उस लड़की की हो गयी !
जिस प्रकार उन लोगों को राजा ने मौका दिया था और उन लोगों ने गलती की ठीक उसी प्रकार ईश्वर भी हमे हररोज मौका देता है और हम हररोज गलती करते है ! हम ईश्वर को हाथ लगाने अथवा पाने की बजाएँ ईश्वर की बनाई हुई संसारी वस्तुओं की कामना करते है और उन्हें प्राप्त करने के लिए यत्न करते है पर हम कभी इस बात पर विचार नहीं करते कि यदि ईश्वर हमारे हो गए तो उनकी बनाई हुई प्रत्येक वस्तु भी हमारी हो जाएगी !
ईश्वर बिलकुल माँ की तरह ही है , जिस प्रकार माँ अपने बच्चे को गोदी में उठाकर रखती है कभी अपने से अलग नहीं होने देती ईश्वर भी हमारे साथ कुछ ऐसा ही खेल खेलते है ! जब कोई बच्चा अपनी माँ को छोड़कर अन्य खिलौनों के साथ खेलना शुरू कर देता है तो माँ उसे उन खिलौनों के खेल में लगाकर अन्य कामों में लग जाती है ठीक इसी प्रकार जब हम ईश्वर को भूलकर ईश्वर की बनाई हुई वस्तुओं के साथ खेलना शुरू कर देते है तो ईश्वर भी हमे उस माया में उलझाकर हमसे दूर चले जाते है पर कुछ बुद्धिमान मनुष्य ईश्वर की माया में ना उलझकर ईश्वर में ही रमण करते है और उस परम तत्व में मिल जाते है फिर उनमें और ईश्वर में कोई भेद नहीं रहता ! इसी बात को गुरु ग्रन्थ साहिब में इन शब्दों में कहा गया है –
” जाके वश खान सुलतान , ताके वश में सगल जहान “
अर्थ – जिसके वश में ईश्वर होते है उसके वश में सारी दुनियाँ होती है।
            जय शिव शंकर 

शिव पूजा के लिए सोमवार का दिन श्रेष्ठ माना गया है।



जीवन की हर समस्या का शिवजी की पूजा आसानी से हल हो सकती है। इनकी पूजा के लिए कोई विशेष दिन या मुहूर्त देखने की आवश्यकता नहीं होती। फिर भी कई विद्वानों द्वारा शिव पूजा के लिए सोमवार का दिन श्रेष्ठ माना गया है।

 

ज्योतिष शास्त्र के अनुसार सोमवार चंद्र देव का दिन माना गया है। कुंडली में चंद्र का महत्वपूर्ण स्थान है। चंद्र के आधार पर ही हमारी जन्म राशि का निर्धारण होता है। यदि जन्म कुंडली में चंद्र से संबंधित कोई दोष हो तो सोमवार के दिन शिवजी के पूजन से वह दोष शांत हो जाता है। शिव को शशिधर भी कहा जाता है क्योंकि शिवजी ने चंद्र को अपने मस्तक पर धारण कर रखा है।

 

शास्त्रों के अनुसार सभी देवी-देवताओं की पूजा के लिए अलग-अलग विशेष दिन निर्धारित किए गए हैं। सोम शब्द का अर्थ होता है चंद्रमा। चंद्रमा को चंचल ग्रह माना गया है, साथ ही यह हमारे मन का नियंत्रक भी है। चंद्र को शिव ने मस्तक पर स्थान दिया है अर्थात् शिव सच्चे मन से उनकी आराधना करने वाले श्रद्धालु को अपने मस्तक पर चंद्र के समान सुशोभित करते हैं। इस बात का मतलब यही है वे भक्तों की सभी मनोकामनाएं पूर्ण करते हैं। भगवान अपने भक्तों के अधिन माने गए हैं।

 

शिवजी का सोमवार से सीधा संबंध है। सोम शब्द में ऊँ शब्द भी विद्यमान है। ऊँ शिवजी का ही प्रतीक है। सोमवार, चंद्रमा और शिवजी इन तीनों का आपस में गहरा संबंध है। इसी वजह से प्राचीनकाल से ही सोमवार को शिवजी का दिन माना जाता है।